तेजाजी चौक में 51 फीट का रावण, सांगानेर व लेबर कॉलोनी में दहन होंगे 20-20 फीट ऊंचे रावण
- दशहरा पर्व की तैयारियां जोरों पर
- पुतलों को दिया जा रहा अंतिम रूप
भीलवाड़ा लोकजीवन। वस्त्रनगरी में असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की शाश्वत विजय का प्रतीक विजयादशमी दशहरा पर्व 20 अक्टूबर को हर्षोल्लास व पारंपरिक उत्साह के साथ मनाने के लिए तैयारियां अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं। पर्व को भव्य और ऐतिहासिक बनाने के लिए नगर निगम प्रशासन की ओर से पुतला निर्माण, मैदान की साज-सज्जा और सुरक्षा व्यवस्थाओं को तेजी से पूरा किया जा रहा है। शहर के तेजाजी चौक स्थित मुख्य मैदान के साथ-साथ उपनगर पुर, सांगानेर और लेबर कॉलोनी में भी रावण दहन की गूंज और आकर्षक आतिशबाजी का अद्भुत नजारा देखने को मिलेगा।
तेजाजी चौक में जलेगा 55 फीट ऊंचा लंकेश
दशहरे का मुख्य और सबसे बड़ा सार्वजनिक आयोजन नगर निगम के तत्वावधान में तेजाजी चौक में संपन्न होगा। यहां बुराई के प्रतीक 55 फीट ऊंचे दशानन रावण के विशालकाय पुतले को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इसके साथ ही लंकापति के अनुज कुंभकर्ण और पुत्र मेघनाद के 35-35 फीट ऊंचे पुतले भी तैयार किए जा रहे हैं। नगर निगम के दिशा-निर्देशों के अनुसार, पुतलों में विशेष तरह के फैंसी पटाखे, चकरियां और प्रदूषण-मुक्त ग्रीन आतिशबाजी फिट की जा रही है। दहन के दौरान जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का अग्निबाण रावण की नाभि पर लगेगा, तब आंखों को चौंधिया देने वाली रंग-बिरंगी रोशनी और कानफोड़ू धमाकों के साथ भव्य नजारा देखने को मिलेगा।
उपनगरों में भी 20-20 फीट के पुतलों का होगा दहन
तेजाजी चौक के अलावा शहर के अन्य प्रमुख रिहायशी इलाकों में भी हर साल की तरह इस बार भी दशहरे का उल्लास चरम पर रहेगा। सांगानेर, लेबर कॉलोनी और उपनगर पुर में करीब 20-20 फीट ऊंचे रावण और कुंभकर्ण के पुतलों का निर्माण कार्य युद्धस्तर पर चल रहा है। स्थानीय आयोजकों ने बताया कि इस बार दर्शकों के विशेष आकर्षण के लिए मुख्य पुतलों के साथ रावण की आसुरी सेना, राक्षस और पौराणिक जंगली जानवरों के प्रतीकात्मक पुतले भी बनाए जा रहे हैं, जो बच्चों और युवाओं के लिए कौतूहल का केंद्र रहेंगे।
तीन पीढिय़ों से परंपरा निभा रहा सोरगर परिवार
सांप्रदायिक सौहार्द और गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल पेश करते हुए इन पुतलों के निर्माण का जिम्मा कुशल कारीगर अब्दुल समद सोरगर और उनका परिवार संभाल रहा है। अब्दुल समद ने बताया कि उनका परिवार पिछले तीन पीढिय़ोंं से भीलवाड़ा में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले बनाने की इस पारंपरिक कला को जीवित रखे हुए है। दादा और पिता के सानिध्य में सीखी गई इस विधा को अब उनकी तीसरी पीढ़ी पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ आगे बढ़ा रही है। बांस की खपच्चियों को तराशने, पुतलों के विशाल ढांचे तैयार करने, रंग-बिरंगे कागजों की सजावट और आतिशबाजी की वायरिंग तक के हर बारीक काम में पूरा परिवार दिन-रात जुटा हुआ है। आगामी 20 अक्टूबर को शहरवासी एक बार फिर बुराई के अंत और अच्छाई के विजयोत्सव के साक्षी बनेंगे।
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