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राजसमन्द

विशाल बावा ने श्रीजी प्रभु की हवेली में किया श्री लाल गोविंद मंडान का शुभारंभ

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लोकजीवन संवाददाता

03 नवम्बर 2026, 01:06 PM 2 मिनट में पढ़ें

विशाल बावा ने श्रीजी प्रभु की हवेली में किया श्री लाल गोविंद मंडान का शुभारंभ

 राजसमंद लोकजीवन न्यूज। नाथद्वारा पुष्टिमार्गीय प्रधान पीठ प्रभु श्रीनाथजी की हवेली में कार्तिक कृष्ण पक्ष अष्टमी के शुभ अवसर पर श्रीजी प्रभु की हवेली में स्थित प्रीतमपोल स्थित भवन मे पुष्टिमार्गीय एवं वल्लभ कुल की वैष्णव परंपरा में वैष्णव-सुख, सेवा-भावना एवं आहार-मर्यादा के संरक्षण की दृष्टि से विशिष्ट महत्त्व रखने वाली प्राचीन परंपरा ‘मंडान’ का पुन: शुभारंभ तिलकायत  विशाल बावा की प्रेरणा से सोमवार कार्तिक कृष्ण पक्ष अष्टमी के शुभ अवसर पर श्री लाल गोविंद मंडान का शुभारंभ किया। इसका मुख्य उद्देश्य वैष्णवजन को श्री नंदालय के प्रांगण में ही पूर्ण शुद्धता, सेवा-भावना एवं समर्पणपूर्वक सिद्ध किया हुआ मंडान का महाप्रसाद वैष्णव जन को भोजन प्रसादी के रूप में प्राप्त हो। इस सेवा की विशेष बात यह है कि यह सेवा वैष्णवजनों के लिए पूर्णत: नि:शुल्क रहेगी।   इस अवसर पर विशाल  बावा ने अपने प्रवचन में मंडान परंपरा के ऐतिहासिक एवं पुष्टिमार्गीय भावनात्मक महत्व के बारे में विशेष रूप से अपने उद्बबोधन में बताया कि पुष्टिमार्गीय परंपरा में मंडान का विशेष संबंध मर्यादी वैष्णवों की आहार-मर्यादा से रहा है। मंडान की इस व्यवस्था का प्रतिपादन गुंसाई जी द्वारा उन मर्यादी वैष्णवों के सुखार्थ किया गया था, जो यात्रा अथवा अन्य कारणों से अपने निवास स्थान से बाहर रहने पर बाहरी भोजन ग्रहण नहीं करते थे। ऐसे वैष्णवों का संपूर्ण जीवन प्रभु को भोग अर्पित होने के पश्चात प्राप्त होने वाले प्रसाद रूपी भोज्य पदार्थों पर ही आश्रित रहता था। अत: उनकी आहार-संबंधी मर्यादा का निर्वाह हो सके तथा यात्रा के समय भी उन्हें प्रभु के भोग से संबंधित शुद्ध एवं सात्त्विक भोजन सुलभ हो सके, इसी भाव से मंडान की परंपरा विकसित हुई। नाथद्वारा में यह नि. ली. गोवर्धनलालजी महाराज के सेवाकाल में यह परंपरा वैष्णवजनों के सुखार्थ एवं सुविधार्थ हेतु श्रीजी प्रभु की हवेली में ही आप श्री द्वारा पधराए गए सेव्य स्वरूपों को भोग अरोगाकर व श्रीजी प्रभु का प्रसाद प्रदान कर मंडान का नियमित संचालन करवाया जाता था।  तत्पश्चात प्रभु को अर्पित वही भोग वैष्णवजनों को प्रसाद रूप में प्राप्त होता था। इस प्रकार मंडान की व्यवस्था केवल भोजन उपलब्ध करवाने तक सीमित न रहकर प्रभु के भोग एवं प्रसाद के माध्यम से वैष्णवों की आहार-मर्यादा के निर्वाह का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम बनी रही।

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